Wednesday, 31 October 2012


चुप्पी  


ऐसा क्यों होता है,

जब बहुत कुछ होता है मेरे पास कहने को, तुम सुनना नहीं चाहते,
बहुत सही होंगे तुम्हारे कारण, पर मेरी बातें भी कम ज़रूरी नहीं,

कितना कुछ सोचा होगा, कितनी भूमिकाएं बाँधी होंगी.
तुम्हारे reactions का भी आंकलन किया होगा,
तुम्हारी चुप्पी को तोड़ने के कितने तरीके खोजे होंगे,
साहस की तो मुझमे कमी नहीं, कम से कम तुमसे तो मैं डरती नहीं,
फिर भी कितना धोया पोंछा होगा अपनी बात को तुमसे कहने से पहले
कि वो  तुम्हारे कानों से होते हुए दिल तक पहुँच जाए और
 छोटा ही सही मगर मेरी उम्मीद का जवाब आये

मगर नहीं, आखिर कोई बात भी तुम्हारी चुप्पी से बड़ी नहीं
जाने क्या सोच के तुम कुछ नहीं कहते,
मेरी बातें नादान हैं और तुम्हारी समझदारी भरी ही सही
पर वही, वही तो है जो मैं सुनना चाहती हूँ ,
तुमसे कैसी भी सही बात करना चाहती हूँ
तुम्हारी चुप्पी तो कुछ नहीं कहती, न सही न गलत, कुछ भी नहीं
बस confuse करती है,
तुम्हारी चुप्पी में तुम्हारा प्यार टटोलते थक गयी हूँ,
तुम्हारी समझदारी भरी चुप से अपनी बातों की हेठी कराते भी थक गयी हूँ

अब मैं भी चुप हूँ,
सब कहते हैं समझदार हो गयी हूँ,
रिश्ता निभाना सीख गयी हूँ
तुम भी आराम से हो, मुझे भी अब ज्यादा तकलीफ नहीं होती,
कहते हैं न सबसे अच्छे रिश्तों में शब्दों की ज़रुरत नहीं रहती.

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