दर्द
ये क्या मुकाम है ज़िन्दगी का,
न मौत है न जीवन ही है बाकी,
बस उखड़ी उखड़ी सी साँसे हैं,
ढो रही हैं बोझ अपने होने का।
उम्मीद भी नहीं, चारा भी नहीं कोई,
किसी युक्ति, उपाय का सहारा भी नहीं कोई.
काश इस दुनिया में दो और दो चार ही न होते,
कुछ जगह चमत्कारों की भी होती.
ईश्वर भी अपने होने का अहसास अब नहीं कराता,
दुःख में वो भी साथ छोड़ गया दीखता है.
कहाँ जाएँ, किससे बात दिल की कहें हम,
ये दर्द कहने सुनने से भी कहाँ कम होता है.
इस बंजर सहारा में हजारों मृग मरीचिकाएँ हैं,
भटकना मजबूरी है सो भटक रहे हैं.
वही दर्द इन्तिहाँ है, वही आँख में आंसू,
वक़्त थमता भी नहीं और बदलता भी नहीं.