Thursday, 1 November 2012

दर्द 



ये क्या मुकाम है ज़िन्दगी का, 
 न मौत है न जीवन  ही है बाकी, 
बस उखड़ी उखड़ी सी साँसे हैं,
ढो रही हैं बोझ अपने होने का।

उम्मीद भी नहीं, चारा भी नहीं कोई,
किसी युक्ति, उपाय का सहारा भी नहीं कोई.

काश इस दुनिया में दो और दो चार ही न होते,
कुछ जगह चमत्कारों की भी होती.
ईश्वर भी अपने होने का अहसास अब नहीं कराता,
दुःख में वो भी साथ छोड़ गया दीखता है.

कहाँ जाएँ, किससे बात दिल की कहें हम,
ये दर्द कहने सुनने से भी कहाँ कम होता है.
इस बंजर सहारा में हजारों मृग मरीचिकाएँ हैं,
भटकना मजबूरी है सो भटक रहे हैं.

वही दर्द इन्तिहाँ है, वही आँख में आंसू,
वक़्त थमता भी नहीं और बदलता भी नहीं.



परवरिश 


एक नदी .
उछलती  कूदती, झरने सी फूटती,
शोर मचाती, ऊर्जा से भरपूर,
वेगमयी, अपने शैशव काल मे,

फिर धीर गहन गंभीर, उतर के धरातल पर,
गर्भ मे विद्युत का तेज लिए,
अनगिनत नहरों की संभावना लिए,
अपार विस्तार लिए ,
पर अपनी दिशा, मर्यादा खुद चुनते हुए

सुंदर,मनोहर,
नियंत्रण मुक्त, बिना किसी अंकुश के,
पर,
लाँघ जाती है सीमा,
तोड़ देती है अपने ही बंध,
विद्रोहिणी, तब  ना बन्धती है ना रुकती,
कर देती है सब तहस नहस
जब भर जाती है ऊपर तक,
डूबती बिफरती अपने ही पानियों में,

तुमही कहो कैसे करूँ परवरिश अपने नन्हों की,
बहने दूं जैसे कि एक नदी, प्रकृति पदत्त,
अपनी नियति की ओर।
या फिर
दे दूँ उन्हे एक निश्चित दिशा,
कर दूँ उन्हे सुरक्षित, मज़बूत सीमाओं के बीच,
सिखाऊँ मर्यादा मे रहना और सही दिशा मे बहना,
सुनियोजित, जोखिम मुक्त,
एक नहर की तरह,
समजोपयोगी.